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Showing posts from March, 2026

लट्टू

डोरी छूटी , लट्टू घूमा , मिट्टी ने आनंद चूमा।   गति का सम्मान कर , कभी-कभी झूमता हथेली के धरातल पर , और सिखाता कि संतुलन शोर में नहीं , स्वीकृति में जन्म लेता है,   बस अपनी धुरी से ईमानदार रह कर , उठता ठोकर खाकर ,   वह खिलौना कहीं नहीं गया , बस समय के हाथों आकार बदल गया,   अब उम्मीद की डोरी , मिट्टी ज़िम्मेदारी की , और हथेली पूरी दुनिया है ,   इस नए युग का लट्टू मैं हूँ।

मोज़े

    मैं सोचता हूँ, जब मोज़े बनाए होंगे किसी ने , क्या एक ही रंग के रंगे होंगे दोनों ? पाँव का सही मोज़ा कैसे पहचाना होगा उसने ? लगे महीने या बरस समझने को अंतर , क्या बराबर रहे होंगे दोनों ? या बस साथ रख देने मात्र से , जोड़ा मान लिया गया होगा ? कभी बायाँ दाएँ से थक जाता होगा , कभी दायाँ बाएँ की गर्मी सह लेता होगा। एक में छेद उभरा होगा पहले , दूसरा चुपचाप इज़्ज़त निभाता रहा होगा। यूँ तो काम का नहीं रहता दूसरा , एक के रेशे फटने के बाद , मगर कभी किसी ने सुनी है , उनकी बिछड़ी जोड़ी की आह ? मैं सोचता हूँ, जब मोज़े बनाए होंगे किसी ने , क्या एक ही जैसे रहे होंगे दोनों ?

मैं समर्पित हूँ

  मैं अभिनेता तब बना , जब मौन रहना मेरी भूमिका थी ,   मैंने एक रोज़ बगावत की खुद से , क्योंकि मेरे शब्द भीड़ से डरते थे ,   मैं अभिनेता बना ताकि शब्द देह पा सकें , और भाव बोली सीख सकें।   तालियाँ लक्ष्य नहीं थीं , वो तो रास्ते में मिलने वाला शोर थीं।   मेरी कला ने मुझसे कुछ नहीं माँगा , सिवाय ईमानदारी के ,   नहीं बनना चाहता मैं बड़बोला पात्र , मैं था मैं हूँ और रहूँगा लक्ष्य को समर्पित ,   इसलिए मैं आज अपने अंतिम क्षण में कहता हूँ , मेरा अभिनय अभी शेष है , मैं समर्पित हूँ । 

नदी संवाद

  मैं नदी संवाद चाहती हूँ , किसी से कुछ छिपा नहीं हैं। मैंने सभ्यताओं को जन्म दिया और तुम्हारे अपराध भी धोए। जो नन्हें बालक मेरी पीठ पर काग़ज़ की नाव चलाते थे , आज वही मुझ में ज़हर भी घोलते हैं। जब मुझे माँ कहा तब मैं पवित्र थी , और अब गंदे नाले के समान देख नाक सिकोड़ लेते हैं। मैं न रोती हूँ , न सूखती हूँ, मैं बस हिसाब रखती हूँ। मुझे याद है पहला घर जो मेरे किनारे बसा था , और आख़िरी फ़ैक्ट्री जो मेरे मुँह पर झुक आई थी। याद रहे- अब मेरी हर बूँद प्यास नहीं , तुम्हारा समय जा रहा है। मैं मौन होने वाली हूँ , सुनो उससे पहले मैं नदी संवाद चाहती हूँ।

खिड़की से परिचय

  आज मेरा परिचय मेरी खिड़की से हुआ , जो झाँकती है बाहर भी , और ताकती है मुझे भी।   वो जानती है सुबह की हल्की धूप , दोपहर की थकी हुई रोशनी , और शाम की उदास परछाई।   वो जानती है बरसात की मद्धम दस्तक , सर्दी की चुप्पी , और गर्मी की बेचैनी।   वो पहचानती है हर एक मौसम को , और कुछ-कुछ जानती है मुझको भी।   मैं बदलता रहा कभी हँसता , कभी चुप , कभी अपने ही बोझ से झुका हुआ।   पर खिड़की वहीं रही , हर दिन खुलती-झूलती , हर रात बंद होती , बिना कोई सवाल किए।   शून्य प्रश्नों के साथ, आज मेरा परिचय मेरी खिड़की से हुआ ।