लट्टू
डोरी छूटी , लट्टू घूमा , मिट्टी ने आनंद चूमा। गति का सम्मान कर , कभी-कभी झूमता हथेली के धरातल पर , और सिखाता कि संतुलन शोर में नहीं , स्वीकृति में जन्म लेता है, बस अपनी धुरी से ईमानदार रह कर , उठता ठोकर खाकर , वह खिलौना कहीं नहीं गया , बस समय के हाथों आकार बदल गया, अब उम्मीद की डोरी , मिट्टी ज़िम्मेदारी की , और हथेली पूरी दुनिया है , इस नए युग का लट्टू मैं हूँ।