खिड़की से परिचय
आज
मेरा परिचय
मेरी
खिड़की से हुआ,
जो
झाँकती है बाहर भी,
और
ताकती है मुझे भी।
वो
जानती है
सुबह
की हल्की धूप,
दोपहर
की थकी हुई रोशनी,
और
शाम की उदास परछाई।
वो
जानती है
बरसात
की मद्धम दस्तक,
सर्दी
की चुप्पी,
और
गर्मी की बेचैनी।
वो
पहचानती है
हर
एक मौसम को,
और
कुछ-कुछ
जानती
है मुझको भी।
मैं
बदलता रहा
कभी
हँसता,
कभी
चुप,
कभी
अपने ही बोझ से
झुका
हुआ।
पर
खिड़की वहीं रही,
हर
दिन खुलती-झूलती,
हर
रात बंद होती,
बिना
कोई सवाल किए।
शून्य
प्रश्नों
के साथ,
आज
मेरा परिचय
मेरी खिड़की से हुआ।
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