नदी संवाद
मैं
नदी
संवाद चाहती हूँ,
किसी से
कुछ छिपा नहीं हैं।
मैंने
सभ्यताओं को जन्म दिया
और
तुम्हारे अपराध भी धोए।
जो
नन्हें बालक
मेरी पीठ पर
काग़ज़ की नाव चलाते थे,
आज वही
मुझ में ज़हर भी घोलते हैं।
जब
मुझे माँ कहा
तब मैं पवित्र थी,
और अब
गंदे नाले के समान देख
नाक सिकोड़ लेते हैं।
मैं
न रोती हूँ,
न सूखती हूँ,
मैं बस
हिसाब रखती हूँ।
मुझे
याद है
पहला घर
जो मेरे किनारे बसा था,
और आख़िरी फ़ैक्ट्री
जो मेरे मुँह पर
झुक आई थी।
याद
रहे-
अब मेरी हर बूँद
प्यास नहीं,
तुम्हारा समय
जा रहा है।
मैं
मौन होने वाली हूँ,
सुनो उससे पहले
मैं नदी
संवाद चाहती हूँ।
Comments
Post a Comment