मैं समर्पित हूँ

 

मैं

अभिनेता तब बना,

जब

मौन रहना मेरी भूमिका थी,

 

मैंने एक रोज़

बगावत की खुद से,

क्योंकि मेरे शब्द

भीड़ से डरते थे,

 

मैं अभिनेता बना

ताकि शब्द

देह पा सकें,

और भाव

बोली सीख सकें।

 

तालियाँ

लक्ष्य नहीं थीं,

वो तो

रास्ते में मिलने वाला

शोर थीं।

 

मेरी कला ने

मुझसे कुछ नहीं माँगा,

सिवाय

ईमानदारी के,

 

नहीं बनना चाहता

मैं बड़बोला पात्र,

मैं था

मैं हूँ

और रहूँगा

लक्ष्य को समर्पित,

 

इसलिए मैं आज

अपने अंतिम क्षण में कहता हूँ,

मेरा अभिनय अभी शेष है,

मैं समर्पित हूँ। 

Comments

Popular posts from this blog

खिड़की से परिचय

मोज़े

नदी संवाद