लट्टू

डोरी छूटी,
लट्टू घूमा,
मिट्टी ने
आनंद चूमा।

 

गति का सम्मान कर,
कभी-कभी
झूमता हथेली के धरातल पर,


और सिखाता
कि संतुलन
शोर में नहीं,
स्वीकृति में जन्म लेता है,

 

बस अपनी धुरी से
ईमानदार रह कर,
उठता
ठोकर खाकर,

 

वह खिलौना
कहीं नहीं गया,
बस
समय के हाथों
आकार बदल गया,

 

अब
उम्मीद की डोरी,
मिट्टी ज़िम्मेदारी की,
और हथेली
पूरी दुनिया है,

 

इस नए युग का
लट्टू मैं हूँ।


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